Here you will find ghazals, mainly of Mirza Ghalib, that I like. I have included meanings also here which should help the reader understand the deeper meaning inside each of the couplets presented here. The ghazals have been written in Devnagari along with meaning of difficult words in English. If you dive inside each of the ashars, I m sure you will find the cathartic gem I have found in them.

1.      ????? ??  ??-?-??? ??  ???  ???????? ???
?????? ??? ?? ?? ????? ?? ???? ????? ???

[ ??-?-??? = lover's nature/behaviour/habit; ??? = fire; ???????? = flame; ????? = sorrow ]

2.      ??  ?? ???, ???? ????? ????-?-???? ??? ?
??  ??? ????? ?? ?? ???? ?? ????? ???

[ ????-?-???? = world of problems; ?? = night,
????? = separation ]

1.      न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ ना होता तो ख़ुदा होता
डुबोया  मुझको  होने  ने,  ना  होता  मैं  तो  क्या  होता ?

2.      हुआ जब ग़म से यूं बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का
ना  होता  गर जुड़ा  तन  से तो  ज़ानूं पर धड़ा होता

[ बेहिस = shocked/stunned; ज़ानूं = knee ]

3.      हुई मुद्दत के  'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पे कहना, के यूं होता  तो क्या होता ?

[ मुद्दत = duration/period]

1.      वो  फिराक़ और  वो विसाल  कहां ?
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहां ?

[ फिराक़ = separation; विसाल = meeting; शब = night; रोज़ = day; माह = month; साल = year ]
2.      फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़  किसे ?
ज़ौक़-ए-नज़्ज़ा-ए-जमाल  कहां ?


[ ज़ौक़ = delight/joy; जमाल = beauty]

3.      दिल तो दिल वो  दिमाग़  भी ना रहा
शोर-ए-सौदा-ए-ख़त्त-ओ-ख़ाल   कहां ?


4.      थी वो इक शख़्स के तसव्वुर से
अब वो  रानाई-ए-ख़याल  कहां ?

1.      ग़ैर लें  महफ़िल  में  बोसे जाम के
हम रहें यूं तिस्ना-लब पैग़ाम के

[ बोसा = kiss, तिस्ना = thirsty ]

2.      ख़स्तगी  का  तुमसे क्या  शिकवा की ये
हथकण्डे हैं चर्ख़-ए-नीली-फाम के

[ ख़स्तगी = injury; शिकवा = comlaint; हथकण्डे = tactics; चर्ख़ = sky; नीली-फाम = blue colour/complexion]

3.      ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ ना हो
हम  तो  आशिक़  हैं  तुम्हारे  नाम के

 

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है


देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

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